चुनाव आयोग की प्रेस कॉन्फ़्रेंस : सवालों से भागता एक संस्थान

चुनाव आयोग की प्रेस कॉन्फ़्रेंस : सवालों से भागता एक संस्थान

भारतीय लोकतंत्र का गर्व उसकी संस्थाओं पर टिका है। इन संस्थाओं में चुनाव आयोग (Election Commission of India - ECI) सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यही वह संस्था है जिस पर जनता के मताधिकार और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता टिकी हुई है। लेकिन हाल ही में कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा लगाए गए "वोट चोरी" के आरोप और उसके जवाब में आयोजित चुनाव आयोग की प्रेस कॉन्फ़्रेंस ने इस संस्थान की विश्वसनीयता पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

राहुल गांधी ने सीधे-सीधे यह दावा किया कि देश में सुनियोजित तरीके से वोटों की चोरी हो रही है। उनका इशारा मतदाता सूची में गड़बड़ियों की ओर था। यह आरोप सामान्य राजनीतिक बयान नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों पर चोट करने वाला प्रश्न है। अपेक्षा की जा रही थी कि चुनाव आयोग इस आरोप का ठोस और स्पष्ट जवाब देगा। लेकिन प्रेस कॉन्फ़्रेंस में हुआ ठीक उल्टा।

मुख्य चुनाव आयुक्त ने पत्रकारों और विपक्ष के सीधे सवालों पर सीधी प्रतिक्रिया देने की बजाय तकनीकी प्रक्रियाओं, संवैधानिक दायित्वों और प्रशासनिक जटिलताओं का लंबा व्याख्यान दिया। इस रवैये से यह संदेश गया कि आयोग मूल प्रश्नों से बचना चाहता है। यही कारण था कि पत्रकार भी असंतुष्ट रहे और सोशल मीडिया पर मुख्य चुनाव आयुक्त तीखे व्यंग्य और आलोचनाओं का शिकार बने।

प्रेस कॉन्फ़्रेंस के बाद ट्विटर और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म पर लोगों ने लिखा कि यदि चुनाव आयोग वास्तव में निष्पक्ष और पारदर्शी है तो उसे सीधे और साफ़ शब्दों में जवाब देने में हिचक क्यों हो रही है। राहुल गांधी के समर्थकों ने इसे अपने आरोपों की पुष्टि बताया, जबकि सत्ता समर्थकों ने इसे केवल विपक्ष की रणनीति करार दिया। लेकिन जनता के मन में जो संदेह पैदा हुआ, उसे अनदेखा करना आसान नहीं है।

यह स्थिति केवल राहुल गांधी बनाम चुनाव आयोग की लड़ाई नहीं है, बल्कि इससे कहीं गहरी है। लोकतंत्र में सबसे अहम है जनता का भरोसा। यदि चुनाव आयोग उस भरोसे को कायम रखने में असफल होता है, तो पूरी चुनावी प्रक्रिया संदिग्ध हो सकती है। सवाल यह है कि क्या चुनाव आयोग राजनीतिक दबाव में है या यह केवल उसकी संचार-रणनीति की विफलता है? दोनों ही स्थितियाँ लोकतंत्र के लिए खतरनाक हैं।

निष्कर्ष यही निकलता है कि चुनाव आयोग को अपनी संचार शैली बदलनी होगी। केवल तकनीकी प्रक्रियाओं का हवाला देना जनता की शंकाओं को दूर नहीं कर सकता। लोकतंत्र में पारदर्शिता का अर्थ है - साहसपूर्वक, स्पष्ट और समय पर जवाब देना। यदि चुनाव आयोग यही नहीं कर पाया तो उसकी साख पर स्थायी दाग लग सकते हैं।